पंच केदार की पंचम केदार कल्पेश्वर में भव्य रूप से मनाया जाता है शिवरात्रि महापर्व
जोशीमठ। हिमालय क्षेत्र के कल्प क्षेत्र मैं हर वर्ष शिवरात्रि महापर्व भव्य रूप से मनाया जाता है क्योंकि यहां पर भगवान शंकर के पंचम भाग जटा की पूजा होती है शीतकाल के समय पंच केदार के चार केदारों के कपाट बंद रहते हैं। कल्पनाथ मंदिर के कपाट वर्षभर खुला रहते हैं यहां पर भगवान शंकर की जटाओं की पूजा की जाती है यह क्षेत्र समुद्र तल से 20 24 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है कल्पेश्वर कल्प गंगा के पास एक अमरनाथ की गुफा की तरह सुंदर स्थान पर स्थित है कल्पेश्वर के बारे में मान्यता है कि यह कल्पना को साकार करने वाला स्थान माना जाता है इसी स्थान पर सभी देवताओं ने मिलकर शिव की स्तुति की थी देवराज इंद्र के श्राप के कारण इंद्र की राज्य लक्ष्मी और कांति का विनाश हो गई थी और दुर्वासा के श्राप के कारण देवताओं को यहां पर कई कल्पों तक घोर तपस्या करनी पड़ी तब जाकर शंकर प्रकट हुई और कल्पेश्वर में ही उन्होंने अपने त्रिनेत्र से जल दे करके कहां की देवताओं समुद्र मंथन किया त्रिनेत्र का जल समुद्र में डाला उसी के बाद 14 रत्नों की उत्पत्ति होगी उसमें एरावत विष अमृत सभी मिलेंगे वैसे ही देवताओं ने किया था और माना जाता है कि जब जहर समुद्र से निकला तो उसको कहां रखा जाए भगवान शंकर ने अपने कंठ में धारण किया और ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि शिव के जहर को कंठ में धारण करने के कारण कुछ समय मूर्छित रहते हैं और सारे देवता गण उनके शरीर में जल का प्रवाह करते हैं जिससे कि भगवान शंकर ठीक हो जाते हैं ऐसी मान्यता है कि शिवरात्रि के दिन ही भगवान शंकर ने जहर को अपने कंठ में धारण किया था कल्पेश्वर में आज प्रातः ऐसे ही श्रद्धालुओं की लंबी कतार लगी थी और समाचार लिखने तक लगातार भक्तगण भगवान शंकर के दर्शन कर रहे थे यह स्थान उत्तराखंड राज्य की चमोली जनपद के जोशीमठ विकासखंड के अंतर्गत उरगम घाटी के भरकी ग्राम पंचायत में स्थित है और कल्प गंगा के तट पर भगवान शंकर की जटाये विराजमान है यहां पर आप जी कार बस से पहुंच सकते ऋषिकेश से 260 किलोमीटर के लगभग मोटर मार्ग से यहां पहुंचा जा सकता है। शिवरात्रि के दिन चारों पहर यहां विधिवत पूजा अर्चना की जाती है।
