गांव-गांव गूंज रहे नंदा के जागर

श्रीनगर। उत्तराखंड के पहाड़ इन दिनों मां नंदा की भक्ति में डूबे हुए हैं। गांव-गांव में नंदा देवी की लोकजात और बड़ी जात की तैयारियां और आयोजन चल रहे हैं। पहाड़ की शांत वादियों में नंदा के जागरों की गूंज सुनाई दे रही है। ढोल-दमाऊं की थाप और जागरों के बीच लोग मां नंदा के उस रहस्यमयी लोक में जैसे खोते जा रहे हैं, जहां आस्था के साथ लोककथाओं और सदियों पुरानी परंपराओं की गहरी छाप दिखाई देती है।
मां नंदा को पहाड़ की बेटी माना जाता है। नंदा से जुड़ी लोकमान्यताएं, गीत, जागर और यात्राएं केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और सामूहिक स्मृतियों का जीवंत हिस्सा हैं। लोकजात और बड़ी जात के दौरान गांवों में होने वाले अनुष्ठान, नंदा के जागर और पारंपरिक रीति-रिवाज नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जोड़ रहे हैं। इन दिनों पहाड़ में जहां देखिए, नंदा की ही चर्चा है। कहीं जागरों में नंदा की कथा सुनाई जा रही है तो कहीं श्रद्धालु पारंपरिक विधि-विधान के साथ अपनी आराध्य देवी को विदा करने की तैयारी में जुटे हैं। यही वह समय है जब पहाड़ का लोकजीवन अपनी सांस्कृतिक जड़ों के सबसे करीब दिखाई देता है।

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