अद्भुत शांति और आध्यात्मिक केंद्र है बामणी का नंदा का मंदिर

बद्रीनाथ धाम. बामणी की नंदा (अर्थात जिन्हें मूल रूप से दुरियाल कहां जाता है) उन लोगों की कुलदेवी भगवती नंदा है इसका प्राचीन मंदिर बामणी गांव में है बामणी गांव में हर वर्ष नंदा अष्टमी के सप्तमी के पर्व पर भव्य मेले का आयोजन यहां सदियों से होता रहा है नंदा का अर्थ प्रकृति ही नंदा है भगवान कृष्ण की बहन (जिन्हें योगमाया भी कहते हैं) नंदा को आज भी पीला वस्त्र ही भेंट किया जाता है। भादो माह के सप्तमी तिथि को बामणी गांव से फुलारी लोग गांव के ऊपर नीलकंठ के जड़ पर कुबेर फुलाना से ब्रह्म कमल को चुनकर लाते हैं यह दृश्य बड़ा मार्मिक और महत्वपूर्ण है ब्रह्म कमल की क्यारियों में उचित समय मानव के लिए खुला रहती है अर्थात नंदा की सप्तमी तिथि को उससे पहले उसके बाद भी ब्रह्मकमल तोड़ना पूर्ण रूप से वर्जित है कुछ लोग धन्ना सेठ बनने के लिए प्रकृति के इस खजाने को खाली करना चाहते हैं किंतु प्रकृति ही नंदा है यदि हम नंदा को समझ लेंगे नहीं तो एक दिन प्रकृति विनाश लीला कर देंगी आप यदि श्री बद्रीनाथ के दर्शन के लिए गए हैं तो बामणी गांव में भगवती नंदा के दर्शन अवश्य करें यहां पर लीला ढुग्गी, उर्वशी का प्राचीन मंदिर है और उनके दर्शन अवश्य करना चाहिए। उत्तराखंड की आराध्या देवी नंदा के सैकड़ों मंदिर है और विश्व प्रसिद्ध नंदा राज जात यात्रा भी 12 वर्षों के अंतराल में की जाती है भगवती के प्रति बामणी गांव के लोगों की अगात श्रद्धा है। जहां बद्रीनाथ के नजदीक बामणी गांव में नंदा का मंदिर है वही पांडुकेश्वर में भी भगवती नंदा का सुंदर मंदिर है जब यहां देवी पस्वा अवतरित होते हैं उसमें कैलाश घंटाकरण और नंदा के अवतारी पुरुष अवश्य सम्मिलित रहते हैं कभी आपको अवसर मिले यहां के नंदा अष्टमी गाड़ूघडा का कार्यक्रम अवश्य देखें एक परंपरागत संस्कृति की याद दिलाती है।